मेरे ग़ज़ल की हक़ीक़त

उस रु ए माहताब में रखा क्या है
कोई मक़नातिस है 
या कोई नाखुदा ए बादबान 
जो अपने इशारे से 
मेरे अशआर का रुख़ बदल देती है 
मेरे काग़ज़ पे उतार कर 
अपना वो चेहरा रख देती है 
और फिर उभर आते हैं 
कुछ शेर कुछ  नज़्म 
उसका  दीदार करने को मेरे सारे लफ्ज़ 
ज़हन से उत्तर आते हैं
पीले सरसों के फूलों में 
कहीं छिप जाने को 
या गूथ जाने किसी दीवान में 
कहीं किसी सफ़हे पे 
उनके सिर्फ एहसास ए आमद से 
मचलती है जो हलचल कहीं 
उसी शोर से मेरे ज़हन के शाख़ से 
टपकने लगते हैं अशआर  
जिसके ज़बां पे है तेरा नाम जानम 

असरारुल हक़ जीलानी
तारीख़: 18 जनवरी 2015

माहताब- चाँद  ,  मक़नातिस - चुम्बक,    नाखुदा - कश्ती चलाने वाला , 
दीवान- कविताओं का संग्रह , अशआर - कविताएं 

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