दिसम्बर और तुम

जब दिसम्बर का दिन जवान होता है
तुम आकर बैठ जाती हो छत पे
रात की थकी हुई ठण्डी आहों को
सूरज के गर्म लम्स से सेकती हो
और मैं उसके शोंओं पे रश्क करता हूँ 
कि मेरी रूह भी तुम्हारे लम्स से संवर जाए
और यूँ कि दवा हो जाए मेरे दर्द की भी
फिर ठण्डी हवाएं छेड़ती हुई
गुज़र जाती है तेरे गेसुओं को
और रुख ए माहताब पे बिखर जाती है
हुस्न की सारी अदाएं
तुम्हारे लब ओ रुखसार
चश्म ए जां निसार
सब दिसम्बर की सी खुबसूरत हो जाती है

- असरार

No comments:

Post a Comment

Polythenized Death of Nature

The word ‘nature’ and its meaning can give us better understanding of some sociological concepts like freedom, empowerment, unbiased, nonj...