ग़ज़ल

     ग़ज़ल 

हर ज़बां पे छा जाऊं  और नाम  भी न हो 
ऐसा कोई  काम  करूँ  कि आम भी न हो 

ज़ालिम के पंख को पूरा आसमान दे दिया 
परिंदों के  पंख  को  एक शाम  भी  न  हो 

इतना नशा हो मेरी  शिद्दत ए चाहत में 
कि  मैक़दे में  बचा कोई  जाम भी न  हो 

इतने खुदा हो गए हैं मेरे मुल्क में  जैसे 
मन्दिर  में  राम  कोई  काम  भी  न  हो 

माना असरार ए ग़ज़ल कोई काम का नहीं 
तो  क्या  कुछ  शेर  यूँ  बेकाम  भी न  हो 


ग़ज़ल

                                   ग़ज़ल 

नज़्म ओ  ग़ज़ल सब को मुझ से अलग कर  दो 
बस    उसकी    तस्वीर  में   कोई   रूह   भर  दो 

कितने मद्दाह कितने आशिक़ हैं  मेरी ग़ज़ल के 
कोई  उसको  भी  मेरी  ग़ज़ल  से वाक़िफ़ कर दो 

लोग तामीर देखते  हैं इमारत की   बुनयाद नहीं 
किसी   को  तो   मेरे    दर्द  से   वाक़िफ़  कर  दो 

मैंने कितनी मोहब्बतें दफनाई है ग़ज़ल के नीचे 
उन में से  किसी एक  को  अब तो  ज़िंदा  कर दो

उसकी तस्वीर का हूँ आशिक़ या हूँ उसका दीवाना  
उस के   रूह  को  भी  अब   मेरा  दिलबर  कर  दो 

असरारुल हक़ जीलानी 

अल्फ़ाज़ के मायने :
मद्दाह- तारीफ करने वाला;                       तामीर- ईमारत बनाना, बनावट , ईमारत   
नज़्म- कविता ;                                          बुनयाद-जड़, नींव  

Painting is Still Version of Theories and Literature

Recently I received an opportunity to witness paintings of Almas, a fine art studen...