Ganga Dhaba Poem

तहज़ीब ज़िन्दा रखेंगे

हुक्म हुआ कि साहेब को चाय चाहिए
ज़रा सी देर पर साहेब को गुस्सा आया
फिर कुछ देर हो गई
साहेब का ग़ुस्सा दफ़्तर में घूमने लगा
जब कुछ देर और हो गई
तो ग़ुस्सा दफ़्तर से बाहर निकला
और टूट पड़ा सब के सर पर

साहेब को चाय की देरी पर इतना ग़ुस्सा
हमारे चाय के ढ़ाबे पर ख़तरा है
हम बग़ावत पर उतर आएँ तो कम है
हम सड़कों पे निकल आएँ तो कम है
हम तोड़ दें तुम्हारा निज़ाम तो कम है
ढ़ाबे के पत्थर से उठ जाए शोला तो कम है
नर्म सब्ज़ा से उठ जाए पत्थर तो कम है
ढाह दें तुम्हारी दीवारें तो कम है

इन्हीं पत्थरों पे बैठ कर हम
चाय की चुस्कियों पे हम
अमन से इंक़िलाब तक की बात करेंगे
रोक लो तुम, हम तहज़ीब जिंदा रखेंगे  



تہذیب زندہ رکھیںگے

حکم ہوا کہ صاحب کو چاۓ چاہئے
ذرا سی دیر پر صاحب کو غصّہ آیا
پھر کچھ دیر ہو گی
صاحب کا غصّہ دفتر میں گھومنے لگا
جب کچھ دیر اور ہو گی
تو غصّہ دفتر سے باہر نکلا
اور ٹوٹ پڑا سب کے سر پر

صاحب کو چاۓ کی دیری پر اتنا غصّہ
 ہمارے چاۓ کے ڈھابے پر خطرہ ہے
ہم بغاوت پہ اتر آیں تو کم ہے
ہم سڑکوں پہ نکل آیں تو کم ہے
ہم توڑ دیں تمہارا نظام تو کم ہے
ڈھابے کے پتھر سے اٹھ جاۓ شولہ تو کم ہے
نرم سبزہ سے اٹھ جاۓ پتھر تو کم ہے
ڈھا دیں تمہاری دیواریں تو کم ہے

انہیں پتھروں پہ بیٹھ کر ہم
چاۓ کی چسکیوں پہ ہم
امن سے انقلاب تک کی بات کرینگے
 روک لو تم، ہم تہذیب زندہ رکھیںگے




No comments:

Post a Comment

Painting is Still Version of Theories and Literature

Recently I received an opportunity to witness paintings of Almas, a fine art studen...