ग़ज़ल

     ग़ज़ल 

हर ज़बां पे छा जाऊं  और नाम  भी न हो 
ऐसा कोई  काम  करूँ  कि आम भी न हो 

ज़ालिम के पंख को पूरा आसमान दे दिया 
परिंदों के  पंख  को  एक शाम  भी  न  हो 

इतना नशा हो मेरी  शिद्दत ए चाहत में 
कि  मैक़दे में  बचा कोई  जाम भी न  हो 

इतने खुदा हो गए हैं मेरे मुल्क में  जैसे 
मन्दिर  में  राम  कोई  काम  भी  न  हो 

माना असरार ए ग़ज़ल कोई काम का नहीं 
तो  क्या  कुछ  शेर  यूँ  बेकाम  भी न  हो 


2 comments:

  1. bahut khoob!!

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  2. https://www.facebook.com/ThePENSmovement/posts/1558598571051586

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