Poem : मेहरबाँ लगती हो

मेहरबाँ लगती हो

तुम नज़्मों को मेरे याद करती हो
अब तो तुम मेहरबाँ लगती हो 

फैला कर मेरे दाग़ ए दर्द को  
ढूँढती हो उसमें कोई ख़्वाब गिरे पड़े 
चुन चुन कर हर अल्फ़ाज़ को मेरे  
बुनती हो फिर वही ख़्वाब पुराने
जैसे ख़्वाबों की मलका लगती हो  
अब तो तुम मेहरबाँ लगती हो 

मेरे यतीम लफ़्ज़ों को घर ले जा कर 
अपनी आवाज़ का लिबास पहना कर 
ज़ुबान पे रखती हो 
दिलो जां से जानाँ  
मेरे लफ़्ज़ों पे रक़्सां करती हो 
अब तो तुम मेहरबाँ लगती हो 


वो खाली खाली सा दिन अब बाक़ी नहीं रहा 
वो शाम की उलझनें ख़ुदक़शी कर ली है 
हाँ ये अलग बात है कुछ खलिश है अभी 
मगर तख़य्युल में जानाँ 
हमेशा तुम मेरे दरमियाँ लगती हो 
अब तो तुम मेहरबाँ लगती हो 


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