Saturday, 30 August 2014

ये मैं सोचता हूँ

मैं क़रीब आऊँ तुम्हारे 
और जगाऊँ नींद से तुम्हें 
ज़ुल्फ़ के बादल को बटोर कर 
अपने ख़यालो में समेट लूँ 
ये मैं सोचता हूँ 

पास बैठूँ बता दूँ तुम्हें 
तुमको मैं चाहता हूँ तुमसे ज़्यादा 
तुम्हारे नक़्स मैक़दे के कूंचे से बेहतर है 
तुम्हारा रंग थोड़ा तितलियों ने चुराया है  
ये मैं सोचता हूँ 

जब मेरे पास तुम नहीं होते हो  
जब मैं तन्हाई में बिखर जाता हूँ 
अब जब भी तुम आओगी 
उसी लम्हे खोल कर हर लफ्ज़ कह दूँगा 
ये मैं सोचता हूँ 

जब तुम पास आते हो 
बिखरा हुआ वजूद सिमट जाता है तेरी क़ुर्बत में 
लगता है मिल गया मुझे सब कुछ 
अब बताने की ज़रूरत क्या है तुमको ?
ये मैं सोचता हूँ 

मैंने जो उगल दी थी स्याह रातें 
फटे पुराने दिन को फेंक दिया था नोच कर 
उसे अपनी आँचल से पोछ कर 
सी कर दिन को अपने ज़ुल्फ़ के धागों से 
मेरे डायरी के सफ़हे पे फिर से जोर दोगी 
ये मैं सोचता हूँ 

YE MAI SOCHTA HUN

Mai qareeb aaun tumhare
Aur jagaun Nind se tumko
Zulf ke badal ko bator kar
Apne khayalon mai samet lun
Ye mai sochta hun

Pas baithun bata dun tumhai
Tum ko mai chahta hun tumse zyada
Tumhare naqs maiqade ke kunche se behtar hai
Tumhara rang thoda titliyon ne churaya hai
Ye mai sochta hun

Jab mere pas tum nahi hote ho
Jab mai tanhai mai bikhar jata hun
Ab jab bhi tum aaogi 
Usi lamhe khol kar har lafz kah dunga
Ye mai sochta hun

Jab tum pas aate ho 
Bikhara hua wajood simat jata hai teri qurbat mai
Lagta hai mil gaya mujhe sab kuch
Ab batane ki zarurat kya hai tumko?
Ye mai sochta hun

Maine jo ugal di thi syah ratain
Phate purane din ko phaink diya tha noch kar
Use apni aanchal se pochh kar
Si kar din ko apni zulf ke dhago se
Mere diary ke safhe par phir se jod dogi
Ye mai sochta hun




Monday, 18 August 2014

KHAWAB

ख़्वाब 


तुमने देखा होगा ख़्वाब यहाँ पे 

बादल के चादर में लपेट कर खुद को 

नींद के झूले में झूल जो रही थी कल 

हमने भी झुका के सर 

तेरे रूह के एहसास पे टिका कर आँखों को 

पलकों को सुला था ख़्वाब के दरवाज़े पे 

कि शायद तुम आओगी 

जगाओगी और कहोगी 

मैं ख़्वाब नहीं हूँ 

KHAWAB

Tumne dekha hoga khawab yahan pe
Badal ke chadar mai lapet kar khud ko
Nind ke jhule pe jhul jo rahi thi kal
Hamne bhi jhuka ke sar 
Tere rooh ke ehsas pe tika kar aankhon ko
Palako ko sula diya tha khawab ke darwaze pe 
Ki shayad tum aaogi
Jagaogi aur kahogi
Mai khawab nahi hun

Sunday, 3 August 2014

Bal Kavita : wrote for construction worker children who are taught by ABC Campaign

                              बाल कविता 





                                       मेरा हाथ है कितना प्यारा 
छोटा छोटा न्यारा न्यारा
हम इससे हैं खाना खाते 
पानी पीते इसी हाथ से 
नाख़ून कभी ना बढ़ने देते 
साफ सफाई का ध्यान रखते 
माँगना हम ने छोड़ दिया है 
है पढ़ना लिखना इसी हाथ से 


चिड़िया मेरी दोस्त है
चंदा मेरा मामा है 
चींटी मेरी नानी है 
पेड़ मेरा छाया है 
नहीं मारना चींटी को 
चंदा ने बताया है 
नहीं मारना चिड़िया को 
पेड़ ने सिखाया है 



ईंट पत्थर बालू कंकड़ 
नहीं छुएँगे हम कभी 
माता-पिता जो करते काम 
नहीं करेंगे हम कभी 
मज़दूरी कोई करवाएगा 
नहीं करेंगे हम कभी 
बालू  कोई ढुलवाएगा
नहीं ढोएंगे हम कभी
बिना पढ़े बिना लिखे 
नहीं सोएंगे हम कभी 
शौक से स्कूल जाना 
नहीं छोड़ेंगे हम  कभी 
स्कूल जाना मेरा हक़ 
कामो  हम नहीं जाएंगे  
पढ़ना लिखना मेरा काम 
अनपढ़ बन कर नहीं  रहेंगे



Tuesday, 22 July 2014

खेत की पुकार

खेत की पुकार 

काले काले जले भुने से 
कफ़न में लिपटी थी उसकी लाश 
खोला हटा कर देखा कफ़न को 
तो साँस लेती थी उसकी लाश 
क़रीब बैठा, पूछा 
अभी तो पिछले फ़सल में तुम 
जागते थे पीले फूलों के साथ 
गन्दुम की लहलहाती 
झुरमुट सी बालियों के साथ 
और आज किसने दफ़ना दिया 
तुम्हारे हँसते गाते तन को 
जलते धुँआ में साँस लेता खेत 
सूखे आँसुओं का क़तरा बहा कर कहने लगा
वो नादान दहकाँ  
ज़रख़ेज़ी का नुस्ख़ा समझ कर 
जला दिया मेरे जिस्म के बालों को 

गन्दुम - गेंहू , दहकाँ - किसान , ज़रख़ेज़ी - उर्वरकता

KHET KI PUKAR

Kale kale jale bhune se
Kafan main lipti thi uski lash
Khola hata kar dekha kafan ko
to sans leti thi uski lash
Qareeb baitha puchha
Abhi to pichhle fasal main tum
Jagte the peele phoolon ke sath
Gandum ki lahlahati 
jhurmut si baliyon ke sath
Aur aaj kisne dafana diya 
Tumhare hanste gate tan ko
Jalte dhuwan main sans leta khet 
Sukhe aansuon ka qatara baha kar kahne laga
Wo nadan dahkan 
zarkhezi ka nuskha samajh kar 
Jala diya mere jism ke balo ko

Meaning 
Gandum - Wheat, Dahkan - farmer , Zarkhezi - fertilizer

Thursday, 10 July 2014

A story : Catch me if you can

                          कैच मी इफ यू कैन 
                                                               

नये कपड़े, नई जगह, नये लोग कितने अच्छे लगते हैं ना और ऐसा नहीं है कि पुरानी चीज़ों से मोहब्बत नहीं होती है, होती है मगर ऐसे जैसे अपने वतन की मिट्टी से होती है।  मैं भी ज़िन्दगी की दौड़ में एक चौराहे से आगे बढ़ कर कॉलेज में दाख़िला ले ली थी जो मेरे लिए एक अच्छी ख़बर थी जहाँ सब कुछ नया सा था, दोस्त, जगह, माहौल और मौसम भी। मैं ने पिछले पुराने पलों को  मौसम-ए -खिजा का इंतज़ार किये बग़ैर उसके यादों के सारे पत्ते काट गिरा दिये थे लेकिन इस लिए नहीं कि अपनी ज़िन्दगी के दरख़्त पे पत्ते उगाउंगी, ये तो सोची भी नहीं थी। बस ये था कि रगो को  चूसने वाले सारे पल मैं छोड़ आई थी।
इसी नए मौसम में एक नया पेड़ भी उगा, पत्ते भी आए और खुशबू  अब तक तैरती है, जो मेरा सब कुछ है। अगर लम्हे को कोई फ्रेम करने वाला हुनरमंद होता तो मैं उस से कहती कि एक बड़े से फ्रेम में उस लम्हे को फ्रेम कर दो जब वो मुझे पहली मरतबा  देखा था और फिर कुछ ही पलों में वो मेरी आँखों से यूँ ओझल हो गया जैसे किसी फिल्म का प्रोमो हो, जैसे उस को पर लगे हों सो फ़ौरन उड़ कर बादलों में जा छिपा  हो या किसी तारे को मना कर लेन गया हो , मेरे लिए। और उस फ्रेम को कमरे के सामने वाली दीवार पे लगाती।
हर स्टूडेंट के ज़ुबान पे रहने वाला कॉलेज का टी प्वांट जहाँ पे चाय तो मिलती ही थी साथ ही साथ दिल भी मिलते थे। उसी प्वांट से उस रोज़ मैं गुज़र रही थी तो अंजाम ने मुझे देखा था जैसा वो कहता है, दौड़ कर मेरे क़रीब आया और बग़ैर किसी की मौजूदगी की परवाह किये मुझ से हाय किया, बोला मैं  अंजाम और एक जुमला  इंग्लिश में कहा " कैच मी इफ यू कैन " । उसे मैं ठीक से देख भी नहीं पायी थी कि वो दौड़ लगाई और मुझ से इतना दूर जाकर खड़ा हो गया कि सिर्फ मैं देख सकती थी कि वो खड़ा है। एक मरतबा मेरी तरफ देखा, हाथ हिलाया और गायब। मैं सोची होगा शायद कोई पुराना जानने वाला। मैं क्यूँ उसको पकड़ू, क्यों उसे जानूँ।होगा कोई सरफिरा। मगर फिर भी उस पल का एक कार्बन कॉपी मेरे दिल पे उतर गया था।
दूसरी मुलाकात ऐसी थी जैसे दूर खड़ा कोई साया मुझे चाह भी रहा हो और चिढ़ा भी रहा हो इस तरह कि कह रहा हो पकड़ लो अगर पकड़ सकती हो और ग़ौर से देख भी रहा हो। इस से पहले कि मैं उसे देख कर मुँह फेर लेती उस ने कहा " कैच मी इफ यू कैन " और फिर कैंटीन की भीड़ में खो गया था वो चेहरा।  मैं क्यों उस के पीछे जाती ? क्यों मैं भीड़ को तहस नहस करती हुई उसे पकड़ती ? वो मेरा क्या लगता था।  मगर हाँ पिछली मुलाकात का वो जो कार्बन कॉपी था उसे एक और साथी मिल गया था दूसरी यादगार की शकल में।  मैं उसके इस पागलपंती को झटक कर चाय ली और अपनी दोस्त के साथ क्लास करने चली गई।
तीसरी मुलाकात तो एक अजीब इत्तेफ़ाक़ था। लाइब्रेरी में एक किताब ढूंढ़ रही थी "फेमिनिज्म एण्ड हिस्ट्री " जॉन वालेच की, उसी वक़्त मुझ से कोई टकराया , सॉरी के आर तक भी नहीं पहुँचा होगा कि जब वो मुझे देखा तो कैच मी इफ यू कैन कह कर यूँ भागा जैसे कोई पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी । मैं उस वक़्त ख़ूब हँसी और उसके हाथों से गिरी किताब को दुपट्टे से साफ की और उसकी जगह पे रख दी। ये वो मुलाकात थी जब वो, जिसे अजनबी कहती थी अपना सा लगने लगा था , जिसके दूर होने पर भी क़रीब जाकर कम  से कम उसका नाम पूछ लेना चाहती थी। मैं उस पल अपनी सारी बेपरवाही से आगे आकर उसके बारे में सोचने लगी थी और ये सोची कि अगले मरतबा उससे नाम पूछूँगी। मगर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वो जब भी मुझे देखता दूर से ही कैच मी इफ यू कैन कह कर भाग जाता। और उस इत्तेफ़ाक़ के बाद कई बार ऐसा हुआ। मैंने तो एक बार उसे इशारे से बुलाई भी थी मगर वो सच में सरफिरा था।
एक दिन मेरी झोली में इत्तेफ़ाक़ आया, देखी अन्जाम चुपचाप सर झुकाये किसी सोच में चला जा रहा है । मैं अपनी दोस्त की ओट लेकर उसके क़रीब पहुँची और फ़ौरन उस का  हाथ पकड़ ली और ऐसे चिल्लाई जैसे मैंने क़िला फतह कर ली हो। ख़ुशी के मारे सीना फूल गया था, होटों पे मुस्कानों ने डेरा जमा लिया था और मेरी आँखों में इतनी सारी  ख़ुशी घुस आई थी जिसके लिए जगह बनाने को आँखें बड़ी करनी पड़ी। वो मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा दिया। मैं पूछी " तुम क्यों कैच मी इफ यू कैन कह कर भाग जाते थे। वो एक मरतबा नज़र नीचे किया और फिर नज़रें मिला कर कहने लगा " यही मेरे परपोज़ करने का अंदाज़ है, मोहब्बत को हासिल करने का तरीका है। मैंने जब तुम को पहली मरतबा देखा था मुझे तुम से उसी वक़्त मोहब्बत हो गयी थी।"

                                                                                    असरारुल हक़ जीलानी




        

Saturday, 5 July 2014

   ग़ज़ल 

उठी  है  आवाज़ तो  रहेगी देर तलक 
रात रोशन  हो  जाएगी  सवेर  तलक 

जब  जल  जंगल ज़मीन चिल्ला उठेगी 
मरकज़ भी हिल जाएगी कुछ देर तलक 

आवाज़ हिमालय की निकल आएगी  
बस  हमें इंतज़ार  है  कुछ  देर तलक 

हक़ की  आवाज़ कब खामोश बैठी है 
उठेगी तो  झुक  जाएंगे दिलेर तलक

जो लफ्ज़ हैं धुँआ धुँआ सी चोटियों पे 
बसी है ज़िन्दगी बादलों के घेर तलक  

                                                                 असरारुल हक़ जीलानी 


ये ग़ज़ल मैंने तब लिखी थी जब मैं उत्तराखण्ड आपदा में  उत्तरकाशी गया था वहाँ का नीड असेसमेंट करने। 


Uthi hai aawaaz to rahegi der talak
Raat roshan ho  jayegi sawer talak

Jab jal  jangal  zameen chilla uthegi
Markaz bhi hil jayegi kuch der talak

Awaaz  Himalaya  ki  niakal ayegi 
Bas hamen intezar hai kuch der talak 

Haq ki awaaz kab khamosh baithi hai
Uthegi  to jhuk  jayenge  diler  talak

Jo lafz hain dhuan dhuan si chotiyon pe
Basi hai  zaindagi badalo kr gher talak




Friday, 27 June 2014

ज़िन्दगी बस रंग ही तो है


ज़िन्दगी के दरख़्त पे 
पत्ते जो लगे हैं 
बस रंग ही तो है 
कुछ लाल, कुछ हरे 
कुछ स्याह तो कुछ सफ़ेद 
और फिर उम्र के एक मोड़ पे 
गुलाबी रंग भी शर्माता, मुस्कुराता
डोली सजा कर आ जाता है 
उगाने किसी टहनी पे एक फूल 
जो बहलाता देती है 
और कहती है 
ज़िन्दगी बस रंग ही तो है 
पीते पीते नीले रंग का साँस 
किसी पतझर के मौसम में 
लपेट कर सफ़ेद चादर 
हिलता डुलता हवा में तैरता गिर जाऊंगा 
मिल जाऊंगा पीले रंग में 
और कहूँगा
ज़िन्दगी बस रंग ही तो है   

Transcription

Zindaghi ke darakht pe 
Patte jo hain
Bas rang hi to hai
kuch laal kuch hare 
kuch syah to kuch safed
Aur phir umar ke kisi mod pe 
Gulabi rang bhi sharmata muskurata
Doli saja kar aa jata hai
Oogaane kisi tahni pe ek phool 
Jo bahla deti hai 
Aur kahti hai
Zindagi bas rang hi to hai
Peete peete nile rang ka sans
Kisi patjhar ke mausam mai
Lapet kar safed chadar 
Hilta dulta hawa mai tairata gir jaunga
Mil jaunga peele rang mai
Aur kahunga
Zindagi bas rang hi to hai

Thank you all for giving feedback. I am transcribing the poems in English script fro the ease of those who can not read Devnagiri script.

Tuesday, 24 June 2014

नम आँखों की मुस्कान 

बयाबाँ ए तख़य्युल में  तेरी यादों की खेती की हैँ 
खयालो की बंजर ज़मीन को
तेरे चेहरे की नूर से ज़रख़ेज़ की है 
पुराने बीते हुए लम्हों से काट कर 
कुछ टहनियों को बोया हूँ 

और कभी  कभी आँसुओं की बारिश  से 
नम  करता हूँ ज़मीं  को 
फिर  काटता हूँ हर रोज़ 
हर सुबह हर शाम 
हर पल तेरी यादों की  फ़सल 
जिसपे आँसुओं का खोल होता तो है मगर 
जब छील कर हटाता हूँ उसे 
तो नम आँखों से मुस्कुरा देता हूँ 

                                                        असरारुल हक़ जीलानी           

Saturday, 21 June 2014

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

मेरे  माथे  पे  तेरी  यादों  का  टप्पा पड़ा  है 
तेरी ज़िन्दगी में मेरा भी कुछ हिस्सा पड़ा है 

कमरे की तन्हाई में तेरी परछाई लिए बैठा हूँ 
सुना है  अँधेरे  में तेरे हुस्न  का हिस्सा पड़ा है 

कमबख्त उम्मीद है खत्म होती  ही नहीं है 
पीछे  मेरे हुस्न  आगे  मेरे  मक्का  पड़ा है  

वो जो तोड़  कर लाया था तेरे चेहरे का नूर 
मेरे लफ़्ज़ों में उसी नूर  का क़िस्सा  पड़ा है 

डायरी क़लम किताब छोड़ो मेरी ज़िन्दगी के 
हर  सफ़हे  पे  तेरे  नाम  का  हिज्जे  पड़ा है 

                                                                          असरारुल हक़ जीलानी 

Friday, 20 June 2014

Tasweer Tumhari: A poem

तुम्हारी तस्वीर 


हरे हरे ख्वाबों को तराश कर

देता हूँ शकल पत्तों का 

गीले गीले अहसास के क़तरों से 

ख्यालों की टहनियों पे चिपकाता हूँ उन पत्तों को 

फिर तसव्वुर के तने से जोड़ देता हु उनको 

तो बन जाती है तुम्हारी तस्वीर 


                                                                                        असरारुल हक जीलानी 

I Access poem

I ACCESS

Dream above the sky
Sky over the head
Goal above the peak
Vision rooted in the soil
Emotions deep in the sea
dreams..vision..goal
Sky..stars..moon
All up and downs of the peak
I can access

Walk to the end
Run for the chase
Fly to the highs
Recite for the peace
walk.. talk.. fly..
to feel my being
speed sound place
All space I can access

No matter little number of near ones
No matter no dear ones
love.. peace.. energy..
I can access

No matter of broken wing
No matter of any king
I have will ..i am king
king of things
things that you access
I access

                                              Asrarul Haque Jeelani

This poem is written for I Access Right Mission : TISS initiative for Inclusion

Toward an Additional Social Order

This refers to the article, ‘of lions and dogs’ (IE, September 19). The author argued to inform misunderstood stand of Swami Vivekanand...